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गुरुवार, 15 नवंबर 2018

विश्व मधुमेह दिवस 2018 पर, लखनऊ में जागरूकता वॉकेथन का आयोजन

  • मधुमेह के असरदार प्रबंधन के लिए स्वस्थ, सक्रिय जीवनशैली महत्वपूर्ण है
लखनऊ : भारत में जिस तेजी से मधुमेह के रोगी बढ़ते जा रहे हैं, इस पुरानी बीमारी के प्रभावी प्रबंधन के बारे में जागरूकता पैदा करना महत्वपूर्ण हो गया है। मधुमेह के प्रबंधन में शारीरिक गतिविधि का महत्व बताने के उद्देश्य से, विश्व मधुमेह दिवस 2018 पर लखनऊ में एक जागरूकता वॉकेथन का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व आरएमएलआईएमएस के एंड्रोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. मनीष गुच ने किया। इस वॉकेथन में शरी संख्या में लोगों की व्यापक भागीदारी रही।
मधुमेह सभी उम्र समूहों के लोगों को प्रभावित करता है। भारत में मधुमेह रोगियों में 7 करोड़ 30 लाख वयस्क हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इन वयस्कों में से लगभग 58 प्रतिशत इलाज के दायरे में नहीं हैं। इसके अलावा, अनुमान है कि भारत के हर 12 वयस्कों में से एक व्यस्क मधुमेह से प्रभावित है।
 
डॉ. मनीष गुच ने बताया कि ष्मधुमेह के जोखिम के प्रति संवेदनशील लोगों की संख्या में वृद्धि का मुख्या कारण उनकी गतिहीन बैठे-बिठाये रहने वाली जीवन शैली है, जिनमें चलने-फिरने के अवसर बहुत कम मिल पाते हैं। लेकिन लोग इससे अनजान हैं। लोगों को स्वस्थ और सक्रिय जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित करना समय की आवश्यकता है। रोगियों, स्वास्थ्य का देखभाल करने वाले पेशेवरों और बड़े पैमाने पर जनता की भागीदारी के साथ ही, इस वॉकाथन जैसी पहल, मधुमेह की रोकथाम और इसके प्रभावी प्रबंधन के बारे में चर्चाओं को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।ष्
 
ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड ने प्रारंभिक निदान और मधुमेह के प्रभावी प्रबंधन के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए किये जा रहे अपने प्रयासों के रूप में वॉकेथॉन का समर्थन किया।
 
हालांकि समग्र मधुमेह की देखभाल की स्थिमति में काफी सुधार हुआ है, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में मधुमेह प्रबंधन के महत्व और तरीकों के बारे में जागरूकता अभी भी कम है। मधुमेह की रोकथाम और प्रभावी प्रबंधन के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि बेहद जरूरी है। कई मामलों में, जीवनशैली में कुछ सकारात्मक बदलाव लाकर मधुमेह की रोकथाम की जा सकती है या इसे स्थकगित भी किया जा सकता है।
 
आज भी, मधुमेह को केवल हाई ब्लरड शुगर यानी उच्च रक्त शर्करा वाला रोग माना जाता है। लेकिन उच्च रक्त शर्करा के कारण होने वाली समस्याओं जैसे दिल का दौरा, स्ट्रोक,गुर्दे की विफलता और अंधापन दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर जागरूकता में कमी है। एक संतुलित और स्वस्थ आहार के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि मधुमेह के प्रभावी प्रबंधन में, और कुछ मामलों में रोग की रोकथाम में भी, मदद कर सकती है।
 

बुधवार, 14 नवंबर 2018

प्रतिभा सिंटेक्स ने जरूरतमंद महिलाओं के लिए दिवाली के मौके पर मेरे सपनों का भारत पहल के अंतर्गत रोजगार उन्मुखी कार्यक्रम को सम्पन्न किया

इंदौर : महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने का एक और उत्कृष्ट उदाहरण पेश करते हुए इंदौर स्थित टेक्सटाइल क्षेत्र की अग्रणी कंपनी प्रतिभा सिंटेक्स ने शहर के नेहरू नगर क्षेत्र से आने वाली कुछ जरूरतमंद महिलाओं के लिए दिवाली के मौके पर मेरे सपनों का भारत पहल के अंतर्गत रोजगार उन्मुखी कार्यक्रम को सम्पन्न किया। मेरे सपनों का भारत पहल के तहत प्रतिभा सिंटेक्स ने एक सर्वे के आधार पर नेहरू नगर इलाके की मुख्य जरूरतों को रेखांकित किया और रोजगार के दृष्टिकोण से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने का निर्णय लिया। यह उन महिलाओं के साथ किया गया जिनकी परिवारिक मासिक कमाई तीन हजार रुपये से कम हैं। इसके लिए संबंधित क्षेत्र में काम करने वाले परिवारों की महिलाओं का चुनाव किया गया। प्रतिभा सिंटेक्स की तरफ से इन महिलाओं को दिवाली के दीयों पर आकर्षक पेंट करने का काम सौंपा गया। इस काम के लिए महिलाओं को इलाके के लोकल दीया बनाने वाले से दीया खरीदकर मुफ्त में पेंट और दीया उपलब्ध कराये गए। प्रतिभा की इस पहल में क्षेत्र की कई महिलाओं ने दिलचस्पी दिखाते हुए बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। महिलाओं द्वारा पेंट की मदद से सजाये गए दीयों को प्रतिभा के कर्मचारियों के बीच बेचा गया और उससे होने वाली कमाई को दिवाली के अवसर पर संबंधित महिलाओं के बीच वितरित किया गया।
मेरे सपनों का भारत पहल से लाभांवित हुई जयंती देवी का कहना है कि वह दीयों से हुई कमाई का इस्तेमाल त्यौहार के दौरान होने वालों खर्चों में करेगी और प्रतिभा सिंटेक्स की इस पहल से जुड़ने के लिए अन्य महिलाओं व लोगों को भी प्रेरित करेंगी। कंपनी के डायरेक्टर श्री श्रेयस्कर चैधरी ने बताया कि, मेरे सपनों का भारत पहल के तहत हमने 14 अगस्त से ही इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था। इसके लिए जरूरी था कि हम सबसे पहले शहर के किसी एक इलाके का चुनाव करें और वहां के लोगों की समस्याएं और उनके समाधान को चिन्हित करें। नेहरू नगर का चुनाव होने के बाद, हमने इलाके की मुख्य जरूरतों को समझने के लिए हमने सर्वे कराये। सर्वे के आधार पर ही यह निर्णय लिया गया कि हमें इस दिवाली महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने की मनसा के साथ ही हमने इलाके की महिलाओं को अपने साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया। दिवाली के मौके को ध्यान में रखते हुए हमने उन्हें कलरफुल दिये तैयार करने का काम सौंपा। इसके लिए हमारे कर्मचारियों ने महिलाओं को घर जाकर ट्रेनिंग भी दी। हमारी इस पहल से जुड़कर कई महिलाओं ने आर्थिक लाभ तो ग्रहण किया ही, साथ ही दिवाली के मौके को अपने परिवार के लिए और भी खास बना दिया।
अपने कपड़ों की सर्वोच्च गुणवत्ता के साथ ग्राहकों के बीच मजबूत पकड़ बना चुकी प्रतिभा सिंटेक्स समय समय पर समाज के पिछड़े व अछूते वर्गों को ऊपर उठाने के मकसद से इंदौर व आस पास के इलाकों में इस प्रकार के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती रहती है। हाल ही में कंपनी ने सरकारी स्कूल से आने वाले बच्चों के लिए एक पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया था, जिसके अंतर्गत बच्चों को आकर्षक पुरस्कार बांटे गए थे। इसके अलावा कंपनी किसानों और ग्रामीण इलाकों के लिए भी चिकित्सा शिविर जैसे कार्यक्रमों का गठन करती रहती हैं।

पेप्सीको कंसाईनमेंट ने इनलैंड वाटरवेज़ पर भारत का पहला कंटेनर मूवमेंट प्रारंभ किया


  • भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी के डाँक में पहला कंटेनर वैसेल प्राप्त हुआ।
  • पेप्सीको स्नैक्स के 16 ट्रक लोड के बराबर, 16 कंटेनर कोलकाता से वाराणसी भेजे गए।

वाराणसी : इनलैंड वाटरवेज़ पर भारत के पहले कंटेनराईज़्ड मूवमेंट की शुरुआत करते हुए, पेप्सीको इंडिया पहली कंपनी बनी, जिसने कोलकाता में अपने प्लांट से वाराणसी के पोर्ट पर उत्पादों के परिवहन के लिए कंटेनराईज़्ड वैसेल मूवमेंट का उपयोग किया। पहला कंटनराईज़्ड वैसेल भारत के माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज वाराणसी के नए विकसित किए गए मल्टी-मोडल टर्मिनल पर प्राप्त किया गया। इस अवसर पर पेप्सीको इंडिया के प्रेसिडेंट एवं सीईओ, श्री अहमद अल-शेख भी मौजूद थे।

इनलैंड वाटरवेज़ के विकास में इस ऐतिहासिक क्षण के बारे में श्री अहमद अल शेख, प्रेसिडेंट एवं सीईओ, पेप्सीको इंडिया ने कहा, ‘‘हम विभिन्न राज्यों के बीच परिवहन के प्रभावशाली माध्यम के रूप में इनलैंड वाटरवे सिस्टम प्रारंभ करने के सरकार के प्रयासों का स्वागत करते हैं। यह पर्यावरण के लिए मित्रवत भी है। पेप्सीको को कोलकाता में हमारे प्लांट से वाराणसी के पोर्ट तक उत्पादों के परिवहन के लिए कंटेनराईज़्ड वैसेल मूवमेंट का उपयोग करने वाली पहली कंपनी बनने की खुशी है। यह इनलैंड वाटरवेज़ के विकास में एक महत्वपूर्ण मापदंड है और हमारा मानना है कि यह कंज़्यूमर गूड्स उद्योग में बहुत बड़ी सुविधा प्रदान करेगा।’’

पेप्सीको इंडिया ने 16 कंटेनर शिप किए, जो 16 ट्रकलोड के बराबर हैं। इनमें कंपनी के लोकप्रिय स्नैक्स उत्पाद नेशनल वाटरवे-1 पर पायलट प्रोजेक्ट के तहत भेजे गए। ये उत्पाद कोलकाता में पेप्सीको इंडिया के स्नैक्स प्लांट में निर्मित किए गए और अब इन्हें वाराणसी के विभिन्न बाजारों में वितरित किया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने वाराणसी में नए विकसित किए गए वाटरवे टर्मिनल का उद्घाटन भी किया, जो सागर माला प्रोजेक्ट के तहत बनाया गया। इस एकमात्र कंटेनर वैसेल, एमवी आरएन टैगोर को कोलकाता से 30 अक्टूबर को श्री गोपाल कृष्णा, सचिव (शिपिंग), भारत सरकार एवं श्री प्रवीर पांडे, चेयरमैन, आईडब्लूएआई एवं पेप्सीको इंडिया के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में रवाना किया गया।

सोमवार, 12 नवंबर 2018

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 : भारतीय पंचायत पार्टी ने जारी की 29 प्रत्याशियों की सूची

इंदौर : भारतीय पंचायत पार्टी ने मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सूबे के विभिन्न जिलों से अपने प्रत्याशियों की सूची शनिवार को जारी कर दी है. पार्टी के प्रदेश प्रभारी  डॉ सी पी आर्य ने मीडिया को दी जानकारी में बताया कि सागर जिले से रामगोपाल यादव को उम्मीदवार चुना गया है वहीं अशोकनगर जिले की अशोकनगर विधानसभा सीट से दयालु दास शाक्य, चंदेरी सीट से रविंद्र यादव और मुंगावली सीट से रतन लाल प्रजापति को उम्मीदवार घोषित किया गया है. इसके अतिरिक्त शिवपुरी जिले की कोलारस सीट से लखन सिंह यादव, सीहोर जिले की आष्टा सीट से सोभन सिंह सिसोदिया और इछावर सीट से ठा. राजेंद्र सिंह, शाजापुर जिले की कालापीपल सीट से ठा. प्रसाद वर्मा, गुना जिले की चाचौड़ा सीट से गणेशराम लोधी, गुना विधानसभा सीट से हरीश छिरावत और बम्होरी सीट से बालकराम सेहरिया को उम्मीदवार चुना गया है. छतरपुर जिले की चंदला सीट से कामता प्रसाद बंसल, राजनगर सीट से इखलाख खान, सतना जिले की रामपुर बघेलान सीट से उर्मिला कौर, कटनी जिले की मूंडवाड़ा सीट से अमरेश सिंह, बड़वाड़ा सीट से बनिया कौल, होशंगाबाद जिले से धनीराम गौर, विदिशा जिले की सिरोंज सीट से जसवंत सिंह रावत, शमशाबाद सीट से राजेश मालविय, बासौदा सीट से महेश राजेरिया, रायसेन जिले की साँची सीट से कोमल प्रसाद बंसकार एवं हरदा जिले से सुरेश काजले को विधानसभा उम्मीदवार चुना गया है. इसके अलावा सूबे के भोपाल जिले की हुजूर सीट से राजू पाटीदार व नरेला सीट से संजय सरोज, मुरैना जिले की मुरैना सीट से विकास राजपूत, सबलगढ़ सीट से उषा रावत, जौरा सीट से प्रदीप करार, शुभावाली सीट से सुनील यादव एवं अम्बा सीट से राकेश नागर को उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा गया है. भारतीय पंचायत पार्टी ने अपनी इस लिस्ट के जरिये कुल 29 प्रत्याशियों को टिकट सौंपा है. इसके साथ ही अन्य जिलों के प्रत्याशियों की सूची भी जल्द ही जारी कर दी जायेगी.

मोमो चैलेंज का कहर अब भारत में भी

दिल्ली : जनलेवा ब्लूव्हेल गेम के बाद इन दिनों सोशल मीडिया पर एक और सुसाइड गेम ‘मोमो चैलेंज‘ वायरल हो रहा है । न्यूज़18 इंडिया की एक खास रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर के कई देशों में मासूम बच्चों की जान लेने वाला मोबाइल गेम मोमो भारत में दस्तक दे चुका है। इस ऑनलाइन गेम की वजह से अजमेर की एक लड़की खुदकुशी कर चुकी है।
इस खेल की वजह से विदेशों में कई मासूम अपनी जान गंवा चुके हैं। इस गेम का खाने वाले मोमो से कोई लेना-देना नहीं है ये सिर्फ ऑनलाइन खेले जाने वाला एक गेम है जिसमें मोमो बच्चों को गेम में शामिल होने के लिए उकसाता है, और फिर उसकी हालत ऐसी कर देता है कि बच्चा खुदकुशी के लिए मजबूर हो जाता है।
इस ऑनलाइन गेम की वजह से पहली मौत अर्जेंटीना में हुई थी, जहां 12 साल की एक बच्ची ने आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद दुनिया के कई देशों में मोमो चैलेंज का खौफ कायम हो गया।
भारत के अजमेर में अपने जन्मदिन पर केक काटकर घरवालों को खिला रही 15 साल की एक लड़की के दिलो दिमाग में क्या चल रहा था, इसकी भनक परिजनों को भी नहीं थी, लेकिन जन्म दिन के ठीक तीन दिन बाद उन्हें घर में फंदे से लटकता इसका शव मिला। उस लड़की ने खुदकुशी क्यों की, इस सवाल की पड़ताल शुरू होते ही घरवालों के सामने चैंकाने वाली चीजें आने लगीं। उस लड़की के हाथ में कलाई की नस के पास काटे जाने के निशान मिले जिसे देखने से लगता था कि कट उसने खुद बनाए थे। जब परिजनों ने उसके मोबाइल फोन को खंगाला तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो गई। उनकी बेटी जानलेवा मोमो चैलेंज का शिकार हो गई थी।
मोमो चैंलेंज की वजह से खुदकुशी की खबर मिलते ही पुलिस भी हरकत में आ गई, क्योंकि इस खौफनाक खेल से भारत में मौत का ये पहला मामला है। हालांकि राजस्थान पुलिस ने लड़की के सुसाइड नोट में परीक्षा में कम नम्बर आने की वजह से खुदकुशी की बात लिखे होने का भी दावा किया। लेकिन घरवालों का दावा है कि उसने अपने जन्मदिन पर ही जान देने की तैयारी कर ली थी, लेकिन किसी वजह से ऐसा नही हो पाया फिर तीन दिन बाद उसने फांसी लगाकर जान दे दी।
पश्चिम बंगाल के जलपाई गुड़ी में कविता नामकी एक लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि उसे मोमो नाम के एक कॉलर ने फोन करके मोमो चैंलेंज में हिस्सा लेने के लिए उकसाया था। लेकिन इससे पहले कि वो मोमो चैंलेंज के जाल में फंसती उसने अपने भाई को पूरी बात बता दी। इसके बाद भाई ने तुरंत उस अनजान नंबर को मोबाइल से डिलीट किया और पुलिस से संपर्क साधा।
कविता को जिस नंबर से मोमो चैंलेंज में हिस्सा लेने के लिए कॉल आई थी, वो अमेरिका के अलबामा का है. न्यूज़18 इंडिया ने जब इस मोबाइल नंबर को सर्च किया तो ये नंबर मोमो नाम से दिखने लगा, जिसकी लोकेशन अमेरिका दिख रही थी। हैरत की बात ये है कि कविता को इस नंबर से कॉल तब आया जब उसने गुस्से में आकर फेसबुक पर लिख दिया कि वो मरना चाहती है. इसके बाद मोमो कॉल करके उसे गेम खेलने के लिए मजबूर करने लगा।
ये खेल काफी कुछ वैसा ही है, जैसे कुछ वक्त पहले ब्ल्यूवेल गेम आया था लेकिन इस बार मोमो चैलेंज का खतरा ज्यादा बड़ा इसलिए है, क्योंकि ये वाट्सएप के जरिए तेजी से फैल रहा है।मोमो चैलेंज का सबसे ज्यादा कहर अमेरिका, अर्जेंटीना, फ्रांस, मेक्सि को और जर्मनी में दिख रहा है. इनके अलावा दुनिया के कई देशों में मोमो चैलेंज को लेकर दहशत है। अभिभावकों को चिंता है कि कहीं उनका बच्चा इस जान लेवा गेम के चंगुल में ना फंस जाए। जानकारों के मुताबिक अगर मां-बाप अपने बच्चों पर नजर रखें तो उन्हें मोमो चैलेंज जैसे चक्रव्यूह में फंसने से रोक सकते हैं।

ग्रामोफोन के सुझाव बने किसानों की बेहतरी का उदाहरण



मध्यप्रदेश : ग्रामोफोन एक ऐसा कृषि संबंधी ऐप है जो हर लिहाज से किसानों के लिए लाभदायक सिद्ध हो रहा है। इस ऐप के माध्यम से किसान अपने खेत या फसल से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान आसानी से हासिल कर सकते हैं। ग्रामोफोन ऐप का इस्तेमाल करने वाले मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ के अनेकों किसानों ने पहले से बेहतर उपजा का दावा किया है और दिन प्रति दिन इस लिस्ट में किसानों की बढ़ती संख्या को साफ तौर पर देखा जा सकता है।
  • ग्रामोफोन ऐप का इस्तेमाल करने वाले किसान व परिणाम
किसानों की खेती संबंधी समस्या का निवारण करने वाले ग्रामोफोन मोबाइल ऐप का इस्तेमाल मौजूदा समय में देशभर के लगभग एक लाख किसानों द्वारा किया जा रहा है. इस लिस्ट में एक अन्य नाम मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के ग्राम घिनिधा तहसील से आने वाले किसान दीपक पाटीदार का शामिल हो गया है। दीपक बताते है कि उन्हें ग्रामोफोन ऐप का इस्तेमाल करते हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है लेकिन ग्रामोफोन की सलाह उनके लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है। वह पिछले कई वर्षों से अपने एक बीघा खेत में प्याज की पैदावार कर रहे हैं। दीपक के अनुसार, खेतों से जुडी समस्याओं का सामना करते हुए काम चलाऊ उत्पादन तो हर साल हुआ लेकिन नुकसान की भरपाई हमेशा से ही कमर तोड़ने वाली रही। कई दफा लागत न निकलने की स्थिति भी उत्पन्न हुई जिसकी वहज से खराब आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ा। उन्होंने हर साल की तरह इस बार भी लगभग एक बीघा क्षेत्र में कांदे के बीज बोए, फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार उन्होंने ग्रामोफोन के विशेषज्ञों द्वारा मिले सुझावों के अनुसार फसल का रख रखाव किया। बकौल दीपक ‘‘शुरू से ही कीटनाशक का छिड़काव, मौसम और दवाइयां संबंधी कई समस्याएं आती रही हैं लेकिन ग्रामोफोन आने के बाद इन समस्याओं का समाधान निकालना ज्यादा आसान हो गया हैं। ग्रामोफोन से मिलने वाले सुझावों से बेहतर परिणाम देखने को मिले हैं।‘‘
  • ग्रामोफोन के सुझावों पर अमल करने व न करने वाले किसानों की फसल में अंतर 
दीपक पाटीदार बताते हैं, ‘‘पैदावार अच्छी होने की उम्मीद कम थी क्योंकि पिछले कई सालों से ऐसा ही हो रहा है। फसल अभी खेत में ही है लेकिन इस बार उपजा के आधार पर खेतों की दशा में बड़ा अंतर दिख रहा है। जहां पिछले सालों में कांदे का आकार मध्यम या अति सूक्ष्म होता था वहीं इस बार के कांदे का आकर तुलनात्मक रूप से काफी बड़ा है। खेतों की उर्वरक क्षमता में भी सकारात्मक असर पड़ा है और खेत पहले से ज्यादा खिले हुए नजर आ रहे हैं।‘‘ 
पिछले कई वर्षों से अगल-अलग फसलों का उत्पादन कर रहे दीपक अपने अनुभव के आधार पर बताते हैं कि ग्रामोफोन की सलाह हर लिहाज से लाभदायक सिद्ध हुई हैं। हालांकि उनके आस पास के खेतों में जिन किसानों ने बिना किसी सलाह के पुराने तौर तरीकों का इस्तेमाल कर ही बीज रोपण किया हैं उनके उत्पादन की गुणवत्ता पहले के सामान ही है। साथ ही खेतों की बुरी स्थिति भी जस की तस बनी हुई है।
दीपक की तरह अन्य ग्रामोफोन उपभोक्ताओं द्वारा सांझा किए गए अनुभवों के आधार पर देखें तो जिन किसानों ने ग्रामोफोन से मिले सुझावों पर अमल किया है उन्हें अपने खेतों की उर्वरक क्षमता, फसलों का अधिक उत्पादन, खेतों की बेहतर स्थिति, बीज, दवाइयों, कीटनाशकों, कीट प्रकार, फसल चक्र और मौसम संबंधित कई जानकारियों का लाभ मिला है। इसके इतर जिन किसानों ने ग्रामोफोन का सुझाव लिए बगैर ही बीज रोपण किया उनके खेतों की स्थिति तुलनात्मक रूप से एक सामान ही बनी हुई है। 
सही जानकारी न होने के परिणामस्वरूप किसानों ने फसल के रख रखाव में वहीं लापरवाही बरती जो वह हमेशा से करते आ रहे हैं। नतीजतन उनकी फसलों का उत्पादन हर साल की तरह असंतोषजनक ही हो रहा है। सही जानकारी न होने की वजह से कई खेतों के झुलसे होने या उनमें दरारें पड़ने जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।

किसानों की आय में पिछले 5 वर्षों में हुई महज 59 रूपए की वृद्धि : नरेश यादव बीपीपी अध्यक्ष

  • देश के 76 फीसदी किसान किसी भी प्रकार के बीमा से वंछित....
  • राज्य स्तर पर किसानों की आय में बड़ी असमानता
  • देशभर में करीब 10.07 करोड़ परिवार सिर्फ कृषि पर निर्भर 
  • 52.5 फीसदी किसान कर्जे में डूबे 
यदि आप विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत का असली चेहरा देखना चाहते हैं, तो यहां के किसानों की आर्थिक स्थिति पर गौर करिए, आपके सामने सारी कहानी साफ हो जाएगी. अगस्त 2018 में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने ‘नफीस’ शीर्षक के साथ एक रिपोर्ट जारी की थी. ‘एनएएफआईएस’ (नाबार्ड अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण 2016-17) के मुताबिक साल 2017 में देश के एक किसान परिवार की मासिक आय 8 हजार 931 रूपए थी. इनमें से एक परिवार की औसत सदस्य संख्या 4.9 बताई गई हैं. इस हिसाब से प्रति सदस्य आय 61 रूपए प्रतिदिन होती है. श्नफीसश् में राज्यों के हिसाब से भी किसानों की आय में गंभीर असमानता देखने को मिली है. इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में किसानों की सबसे कम मासिक आय, मध्यप्रदेश (7,919), बिहार (7,175), आंध्र प्रदेश (6,920), झारखंड (6,991), ओडिशा (7,731) और उत्तर प्रदेश (6,668) राज्यों की है. वहीं पंजाब और हरियाणा के किसान परिवारों की मासिक आय क्रमशः 23 हजार 133 रूपए व 18 हजार 496 रुपए दर्ज की गई है. पंजाब-हरियाणा को छोड़ दें तो उपरोक्त आंकड़े किसी वन टाइम पासवर्ड की तरह नजर आते है. जबकि यह असमानता केंद्र सरकार के उस वादे पर भी सवालिया निशान लगाती है जो 2022 तक किसानों की आय दो गुनी करने की बात करती है. सरकार को तो सबसे पहले इस बात का जवाब देना चाहिए कि वह आखिर किस योजना के तहत पंजाब और यूपी के किसानों की आय के बीच बने साढ़े तीन गुना के अंतर को कम करने वाली है? क्योंकि जिस 2022 का लक्ष्य रखा गया है तब तक तो इस असमानता में और भी बड़ा अंतर देखने को मिल सकता है.  

साल 2012-13 में नेशनल सैंपल सर्वे ओर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि उस वक्त तक भारत में एक किसान की औसत मासिक आय 6 हजार 426 रूपए थी. जिसमे 48 फीसदी हिस्सा यानी लगभग 3,081 रूपए की कमाई फसल से होती थी. वहीं 2016-17 में जारी हुई नाबार्ड की रिपोर्ट में यह आय 35 प्रतिशत पर आ गई. रिपोर्ट में बताया गया कि अध्यन के साल किसान परिवार की कुल मासिक आय 8 हजार 931 रूपए थी, जिसमे केवल 3,140 रूपए (35 फीसदी) की आय फसल से हुई. इस लिहाज से पिछले पांच सालों में किसानों की आय में केवल 59 रूपए की वृद्धि ही दर्ज की गई. वहीं आंकड़े यह भी बताते है कि पिछले पांच सालों में किसान की मासिक आय में खेती, उत्पादन और पशुधन से होने वाली आय का हिस्सा अनुपातिक रूप से बहुत कम हुआ है.

नाबार्ड की रिपोर्ट इस बात का खुलासा भी करती है कि देशभर में करीब 10.07 करोड़ परिवार सिर्फ कृषि पर ही निर्भर करते हैं. जिसमे 52.5 फीसदी किसान कर्जे में डूबे हुए है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के एक किसान के पास औसतन 1.1 हेक्टेयर जमीन है, जिसमे से 60 फीसदी जमीन सिंचित नहीं होती है. ऐसे में हर कर्जदार किसान के सिर पर 1.046 लाख रूपए का कर्ज बना हुआ है. नाबार्ड की रिपोर्ट अन्य कई मुख्य बिंदुओं को भी रेखांकित करती है. रिपोर्ट के अनुसार, देश में 76 फीसदी किसान ऐसे हैं जिनके पास किसी भी प्रकार का कोई भी बीमा नही है. इसके अलावा कुल 83 प्रतिशत किसानों के पास जीवन बीमा नही है. वहीं महज 95 फीसदी किसान बगैर किसी स्वास्थ बीमा के जी रहे हैं. आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि देश के 66.8 फीसदी किसानों का कहना है कि उनके पास इतना पैसा ही नहीं है कि वह बीमा करा सके. जबकि 32.3 फीसदी किसान अनियमित आय होने की वजह से बीमा नहीं करा पाने की बात कहते है. ऐसे में इन आंकड़ों की तरफ हमारे प्रधानसेवक और उनके नीतिकारों को ध्यान देने की जरूरत है, ताकि खोखले वादों को धरातल पर लाने में सहायता मिल सके और आंदोलन व आत्महत्या करने पर मजबूर अन्नदाताओं को कर्ज के बोझ और अनियमित आय से छुटकारा दिलाया जा सक

किसानों के गन्ना मीलों पर बकाया 23,000 करोड़ रूपए का माई-बाप कौन ?

  • मौजूदा सरकार समस्याएं घटाने के बजाए और बढ़ा रही हैं
  • मिल मालिक और किसान, दोनों ही परेशान
  • सरकारी नीति बढ़ा रही शुद्ध पेय जल का संकट
  • उत्पादन में हुई बढ़ोतरी और मांग में कटौती

देश के गन्ना किसानों के सामने हजारों करोड़ रूपए का बकाया भुगतान एक जानलेवा समस्या के रूप में कड़ी हुई हैं. जिसके चलते मजबूर किसान समय-समय पर आंदोलन और आत्महत्या करने जैसा गंभीर कदम उठा लेते हैं. विशेषज्ञ मौजूदा हालातों को आगामी सालों में और अधिक गंभीर होने की आशंका जाताते रहे हैं. लेकिन प्रश्न यह उठता हैं कि आखिर किसानों को गन्ने की बकाया राशि क्यों नहीं दी जा रही है और इस समस्या की शुरुआत कहां से हुई और इसका जिम्मेदार कौन हैं? इन सवालों के जवाब ढूंढने से पहले हमें देश के गन्ना व्यापार के पूरे अर्थशास्त्र को समझने की जरुरत हैं जिसमे एक नहीं कई त्रुटियां नजर आती हैं. हमारे देश में गन्ने की कीमत तो सरकारों द्वारा तय की जाती है लेकिन चीनी की कीमत बाजार की मांग और आपूर्ति के आधार पर निर्धारित होती है. मौजूदा समय में मांग और आपूर्ति में विसंगति ही भारी बकाया का मुख्य कारण बन गया है. नए मीठे पदार्थों की खोज और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ी लोगों की जागरूकता के परिणामस्वरूप चीनी की मांग धीरे धीरे कम होती जा रही है. हालांकि मांग में कमी के बावजूद बेहतर बीज, प्रति एकड़ गन्ना की उत्पादकता, और पिछले दशक में गन्ने के फसल के तेजी से भुगतान के कारण उत्पादन में वृद्धि बनी हुई है।
नरेश यादव जी का कहना हैं कि मौजूदा सरकार समस्याएं घटाने के बजाए और बढ़ा रही हैं
भारत ब्राजील के बाद सबसे अधिक गन्ने का उत्पादन करने वाला दूसरा बड़ा देश है. वहीं देश के उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सबसे अधिक गन्ने का उत्पादन होता है. जहां देश में 2015-16 के दौरान 24.8 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन हुआ वहीं 2017-18 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 32 मिलियन टन के भी पार पहुंच गया. जबकि आगामी वर्ष यानी 2018-19 के दौरान इसके 35 मिलियन टन को पार कर जाने की उम्मीद है. हालांकि इतने अधिक उत्पादन के बाद भी मांग केवल 25 मिलियन टन के इर्द गिर्द ही लटकी हुई है. मांग सीमित होने के कारण चीनी के दाम तेजी से नीचे गिरे हैं लिहाजा गन्ने की फसल का बकाया दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है. ऐसे में उपरोक्त कथनों को अपनी जगह सही मान लिया जाए तो भी यह सवाल खड़ा होना लाजमी है कि मिल मालिक आखिर कैसे किसानों को हजारों करोड़ रूपए का भुगतान करने वाले हैं? या करने वाले भी हैं कि नहीं इसकी भी जिम्मेदारी कौन ले रहा है?
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि मिलों पर बकाया की कहानी हाल के सालों तक ही सीमित नहीं है. कई वर्षों से किसानों से गन्ना लेती आ रही यह मिलें कितना कुंटल गन्ना लिया, कितना करदा कटा या कितना भुगतान बना, इन सब का लेखा जोखा लाल, पीली, नीली और सफेद पर्ची के रूप में रखती हैं. लेकिन किसानों को इस बात की जानकारी नहीं दी जाती कि उन्हें भुगतान कब तक किया जाएगा. इससे अधिक चिंता का विषय यह है कि मिलों को बकाया के बोझ से मुक्ति दिलाने और किसानों को समय पर उनकी उपजा का मूल्य दिलवाने की दिशा में आज तक किसी भी सरकार ने एक स्थायी समाधान खोजने की कोशिश नहीं की.
केंद्र की मोदी सरकार ने इसी साल मई-जून के बीच में 8 हजार करोड़ रूपए के राहत पैकेज की घोषणा की थी. इस पैकेज के तहत सरकार की योजना इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ावा देकर और सेल्स कोटे को बाध्य करके बाजार में चीनी की कमी को कम करते हुए चीनी की कीमतों में वृद्धि करने का प्रयास करने की थी. इसके लिए सरकार ने चीनी मिलों को 5732 करोड़ रूपए का ऋण दिया और चीनी से राजस्व पर निर्भरता कम करने के लिए अन्य उत्पादों के बजाए सीधा चीनी से ही इथेनॉल बनाने की छूट दे दी. हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से आने वाली गिरावट के चलते इथेनॉल मिश्रण से अधिक फायदा मिलने की उम्मीद कम ही हैं. इसके अलावा गन्ने में लगने वाली पानी की अधिकता को देखते हुए भी इथेनॉल के उत्पादन पर जोर देना एक बुरी नीति का उदाहरण देती हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 60 करोड़ लोग भारी जल संकट से जूझ रहे हैं और पीने का साफ पानी न मिलने की वजह से हर साल लगभग 2 लाख लोगों की मौत हो जाती हैं. ऐसे में अगर गन्ने की खेती में और अधिक वृद्धि दर्ज की जाती है तो यह देश की आधी से ज्यादा आबादी के लिए गहरा पानी का संकट पैदा कर सकती है.

बुलेट ट्रेन के बदले उपजाऊ व सिंचित खेत हड़पना चाहती है सरकार :नरेश यादव, बीपीपी  अध्यक्ष

  • किसानों द्वारा बुलेट ट्रेन का विरोध पूरी तरह जायज
  • किसान और आदिवासी संगठन जारी रखेंगे विरोध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन के खिलाफ सभी विपक्षी दलों के अलावा गुजरात और महाराष्ट्र के हजारों किसानों ने भी मोर्चा खोल दिया हैं. किसान, गुजरात हाईकोर्ट में इस परियोजना के खिलाफ अपनी याचिका लेकर पहुंच गए हैं और एकजुट होकर बुलेट ट्रेन का विरोध कर रहे हैं. लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि किसान पीएम मोदी की इस महत्वकांक्षी योजना के खिलाफ क्यों हैं जबकि प्रधानसेवक खुद इस योजना को देशवासियों के हित, कल्याण और उत्थान की योजना बता चुके हैं. दरअसल मुंबई से अहमदाबाद के बीच 509 किलोमीटर लंबी
प्रस्तावित बुलेट ट्रेन योजना का लगभग 110 किलोमीटर का कॉरिडोर मुंबई के पास पालघर से होकर गुजरता हैं. पालघर एक आदिवासी बहुल इलाका है. सरकार अपनी 110 लाख करोड़ रूपए की परियोजना के लिए 1400 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण करना चाहती है जिसके लिए वह 10 हजार करोड़ रूपए खर्च करने की बात कहती है. भारतीय पंचायत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश यादव कहते है कि, सरकार ने गुजरात के साथ ठाणे और पालघर के किसानों को भी भूमि अधिग्रहण का नोटिस भेजना शुरू कर दिया हैं. लेकिन सवाल ये है कि अहमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रैन की आखिर जरूरत क्या हैं. भारतीय रेल तंत्र तो सरकार से संभाला नहीं जा रहा है तो बुलेट ट्रेन कैसे संभाली जाएगी! फिर एक बात यह भी है कि बुलेट ट्रेन का किराया ऐसा होने वाला है जो आम आदमी की पहुंच से बाहर होगा और जिसे मोटी रकम खर्च कर इस रुट का सफर करना होगा वो बुलेट ट्रेन से कम खर्च में फ्लाइट से सफर करना पसंद करेगा. रोज हजारों लोग दयनीय स्थिति में पालघर से मुंबई का सफर करते है. जरूरी है कि सरकार पहले से मौजूद रेल व्यवस्था को दुरुस्त करे उसके बाद किसी बुलेट ट्रेन जैसी योजनाओं पर विचार करे।
पिछले दिनों जापान के कौसुल जनरल ने मुंबई और अहमदाबाद में आयोजित हुए कार्यक्रमों में कहा था कि भारत सरकार को बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए जितनी जल्दी हो सके जमीन अधिग्रहण का काम पूरा कर लेना चाहिए. जिसपर अमल करते हुए मोदी सरकार ने गुजरात और महाराष्ट्र के किसानों को नोटिस भेजना शुरू कर दिया. यादव के अनुसार, किसानों द्वारा लड़ी जा रही अपने हक की लड़ाई का ही नतीजा है कि नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड अभी तक सिर्फ 0.9 हेक्टेयर जमीन का ही अधिग्रहण कर पाई है. इस परियोजना का विरोध करने वाले किसान संगठनों का कहना है कि बुलेट ट्रेन परियोजना से गुजरात के किसान भी खुश नहीं है और सरकार ने अपना रवैया नही बदला तो आने वाले समय में एक सर्वदलीय सम्मलेन गुजरात में भी किया जाएगा.
किसान और आदिवासी संगठनों ने साफ कर दिया है कि वह बुलेट ट्रेन के लिए एक इंच जमीन भी सरकार को नही देने वाले हैं. बहरहाल मोदी सरकार को अपनी महत्वकांछी योजनाओं को फलीभूत करने के लिए अपने द्वारा दिए गए सबका साथ सबका विकास वाले फॉर्मूले को अपनाना चाहिए, साथ ही इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि जिन जमीनों को अधिग्रहित करने की मांग की जा रही है वह ऐसे उपजाऊ और सिंचित इलाकों की है, जो निर्यात गुणवत्ता वाले फलों की खेती के लिए जाना जाता है. जरूरी है कि सरकार इसके बजाय समर्पित फ्रेट कॉरिडोर परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि का उपयोग करे. अगर यह भी नहीं हो सकता तो कम से कम किसानों की मांगों को अनसुना न करें।

शनिवार, 3 नवंबर 2018

मोदी पर कायम है भारत का विश्वास, लोग उन्हें ईमानदार, मजबतू और सोच समझ कर फैसला लेने वाले नेता मानते हैंः डेलीहंट सर्वे



  • डेलीहंट, नील्सन इंडिया ने मिल कर भारत का सबसे बडा राजनीतिक डिजिटल सर्वे करवायाः ट्रस्ट ऑफ दि नेशन, जिसमें 50 लाख से अधिक लोगों ने अपना मत रखा
  • सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत के 50 प्रतिशत से अधिक लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बेहतर भविष्य प्रदान करेंगे

नई दिल्ली : समाचार और स्थानीय भाषाओं में कंट्रेट मुहैया कराने वाले भारत के नंबर 1 एप्लीकेशन, डेलीहंट ने आज अपने प्रतिष्ठित सवे “ट्रस्ट ऑफ द नेशन“ के परिणामों की घोषणा की। यह राजनीतिक सर्वेक्षण डेलीहंट और नील्सन इंडिया के साझा प्रयासों के साथ करवाया गया है। इस सर्वेक्षण का सबसे अच्छा वर्णन भारत के सबसे बडे और सबसे निर्णायक एवं स्वतंत्र रूप से करवाये गये राजनीतिक डिजिटल सर्वेक्षण के रूप में किया गया है, जिसमें भारत और विदेशों से 54 लाख से अधिक उत्तरदाताओं ने भाग लिया।

इस अनूठे सर्वेक्षण में देश की चारों दिशाओं में- एक छोर से दूसरे छोर तक के लोगों ने भाग लिया, जिनमें असली भारत के मतदाता शामिल हैं। यानी कि वो मतदाता जो भारत के टियर 2 और टियर 3 शहरों में रहते हैं। इनके अलावा महत्वपूर्ण मेट्रो शहरों से लोग शामिल हुए और वे भी सकिय रूप से शामिल हुए जिन्होंने भारत में वोट देने के लिये पहली बार पंजीकरण करवाया है।

पोल की कार्य प्रणालीः

  • डेलीहंट और नील्सन इंडिया ने संयुक्त रूप से सर्वेक्षण को तैयार किया, जिसे डेलीहंट के प्लेटफार्मों पर होस्ट किया गया और अंग्रेजी, हिन्दी, तेलुगु, कन्नड, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल, मलयालम और ओडिया जैसी 10 भाषाओं में कियान्वित किया गया।
  • डेलीहंट ने डेटा एकत्र किया और नील्सन के एपीआई के माध्यम से इसे नील्सन को मुहैया कराया
  • नील्सन इंडिया ने अतंरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत उन मानदंडों और मानकों के आधार पर आंकडों को एकत्रत किया, जो ऐसे सर्वेक्षणों पर लागू होते हैं 
  • उत्तरदाता विभिन्न आयु समूहों (18-24, 25-34 और 35$ वर्ष) और लिंग के थे
  • “ट्रस्ट ऑफ द नेशन“ ने उत्तरदाताओं से 10 वैकल्पिक प्रश्नों के उत्तर देने का अनुरोध किया 
  • मुख्य अंश। डेलहंट ट्रस्ट ऑफ दि नेशन सर्वे
  • 63 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने 2014 (जब वह सत्ता में आए) की तुलना में नरेंद्र मोदी पर अधिक अथवा समान स्तर का विश्वास व्यक्त किया, और पिछले चार वर्षों से उनकी नेतत्ृव क्षमताओं पर संतुष्टि व्यक्त की।
  • 50 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं का मानना है कि नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल उन्हें बेहतर भविष्य प्रदान करेगा।
  • फोन के प्रयोग को आय के स्तर के संकेतक के रूप मानें तो, 90 प्रतिशत उत्तरदाता छोटे और मध्यम श्रेणी के फोन के उपयोगकर्ता हैं, और नरेंद्र मोदी के समर्थक के रूप में सामने आए। जबकि हाई-एंड फोन के उपयोगकर्ता इसके विपरीत दिखे।
  • उत्तर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत में ’विश्वास’ और ’भरोसा’ कारकों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया गया, जिनमें निम्नलिखित दिलचस्प बातें सामने आयीं :
  1. मैक्रो स्तर पर, कर्नाटक को छोडकर बाकी के सभी दक्षिणी राज्य मोदी के नेतृत्व के बारे में अधिक सतर्क प्रतीत हुए।
  2. एक तरफ ओडिशा में संभावित मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी का उच्च विश्वास और आस्था के साथ समर्थन किया। वहीं दूसरी ओर, तमिलनाडु के मतदाता दोनों मामलों पर सबसे ज्यादा संशय में दिखे
  3. जब 5 राज्यों की बात आयी, जहां चुनाव जारी हैं,
  4. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान सभी वर्तमान में मोदी पर विश्वास बनाये हुए हैं।
  5. तेलंगाना एक मात्र राज्य है जो इस प्रवृत्ति से अलग है


  • भ्रष्टाचार को जड से उखाड फेंकने के सवाल पर 60 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सबसे ज्यादा नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया है। दिलचस्प बात यह है कि इस श्रेणी में आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तुलना में प्राथमिकता मिली।
  • 62 प्रतिशत उत्तरदाताओं को भरोसा है कि राष्ट्रीय संकट के दौरान राष्ट्र का नेतृत्व करने के लिए नरेंद्र मोदी सर्वश्रेष्ठ हैं, इसके बाद राहुल गांधी (17 प्रतिशत), अरविंद केजरीवाल, (8 प्रतिशत), अखिलेश यादव, (3 प्रतिशत) और मायावती, (2 प्रतिशत) क्रमशः हैं।


भारत के सबसे बडे और निर्णायक राजनीतिक डिजिटल सर्वे पर दिल्ली में आयोजित भारत बियॉन्ड इंडिया प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बोलते हुए, डेलीहंट के प्रेसीडेंट श्री उमंग बेदी ने कहा, “वास्तव में ‘ट्रस्ट ऑफ दि नेशन’ हमारे उस उद्देश्य को प्रस्तुत करता है, जो असली ‘भारत’ के लोगों को अपने ववचारों को बडे पैमाने पर साझा करने के ललए एक उपयुक्त मंच तैयार करने का है। हम सामाजिक परिवेश, स्थान, राज्य और भाषा जैसे जनसांख्यिकीय पैमानों के साथ समद्ृध, गहरे और सार्थक तथ्यों को प्राप्त करने में कामयाब हुए हैं, जो वर्तमान भारतीय भावनाओं से जुडी बहुत सहज बातों को प्रदर्शित करते हैं। ’ट्रास्ट ऑफ दि नेशन’ का विचार डेलीहंट के उस मिशन के साथ पूरी तरह से समाहित है, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं में प्लेटफॉर्म के रूप में एक अरब भारतीयों को ऐसा कंटेंट मुहैया कराना है, जो उन्हें जानकारी देने के साथ-साथ शिक्षित करे और उनका मनोरंजन करे। साथ ही वे ऐसे कंटेंट का उपभोग करने के साथ-साथ साझा करने में भी सक्षम हों। इस वृहद स्तर के सर्वेक्षण में सहयोग करने के लिये हम अपने वैज्ञानिक सहयोगी नील्सन इंडिया का आभार व्यक्त करते हैं।”

“नील्सन एक वैश्विक माप और डेटा विश्लेषक कंपनी है, जो दुनिया भर में उपभोक्ताओं और बाजारों के पूर्ण और भरोसेमंद दृश्य को प्रदान करती है। हमें इस सर्वेक्षण का हिस्सा बनने में प्रसन्नता हो रही है, जहां हमने तनठ कषण तक पहुंचने के लिये सवे को तैयार करने व डेलीहंट से प्राप्त आंकडों के अध्ययन में अपनी स्वर्ण मानक वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग किया,” प्रसून बसु, नील्सन-दक्षिण एशिया के अध्यक्ष ने कहा।
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